Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 21, Verses 45–46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 21, verses 45–46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 21 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
अपर्वतमभूमिं च व्योमस्थामरमानवम् ।
अचन्द्रार्कप्रकाशाख्यं कंचित्सर्गं स्मराम्यहम् ॥ ४५ ॥
अनिन्द्रममहीपालममध्यस्थाधमोत्तमम् ।
स्वममन्धककुप्चक्रं कंचित्सर्गं स्मराम्यहम् ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
जल में पृथिवी के निमग्न हो जाने पर जनलोक आदि प्रकाश प्रचुर लोकों के व्यवहारों से उपलक्षित
हुए काल में जो सृष्टि-स्थिति थी, उसका स्मरण कर रहे पक्षीन्द्र भुशुण्ड कहते हैं।
एक समय ऐसी सृष्टि थी - जिसमें पर्वत और पृथिवी का नामशेष ही नहीं था, देवता और योगसिद्ध
पुरूष आकाश में ही रहते थे तथा चन्द्र एवं सूर्य के अभाव में भी परिपूर्ण प्रकाश था - इसका मुझे स्मरण
है