Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 22, Verse 51
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 22, verse 51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 51
संस्कृत श्लोक
सर्गान्निरर्गलाचारान्क्वचित्कांश्चित्स्मराम्यहम् ।
ध्यातरि ब्रह्मणो ब्रह्मन्ससुरासुरमानुषम् ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
हे ब्रह्मन्, हजार चतुर्युगों की समाप्ति में ब्रह्माजी जब जगद्रूप के संहारक्रम से जल में शयनकर
योगनिद्रा के व्याज से परमात्मा का ध्यान कर रहे थे, तब यह देवता, दानव एवं मनुष्य से युक्त जगत
शून्य असत्स्वरूप की नाई हो गया था - इसका मुझे स्मरण है