Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 23, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 23, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
एते ब्रह्मन्महादोषाः संसारव्याधिहेतवः ।
मनागपि न लुम्पन्ति चित्तमेकं समाहितम् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
दोषों का उपसंहार कर रहे भशुण्डजी-मूत्यु विजय में हेतुभूत गुणों का उपक्रम करने के पहले
समाधान ही मुख्य गुण है, इस आशय से - समाधान की प्रशसा करते है ।
हे ब्रह्मन्, पूर्व में बतलाये गये ये महान दोष संसार रूपी व्याधि के कारणभूत हैं, वे दोष समाहित
चित्त को तनिक भी विच्छिन्न नहीं करते