Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 25, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
प्राणस्तावद्विचार्यन्तेऽदेशकाले न शोच्यते ।
हृदि चन्द्रार्कयोर्ज्ञात्वा नित्यमस्तमयोदयम् ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
उसी प्रकार अन्तःकुम्भक में भी हृदयगत प्राण ओर अपान की सन्धि में प्रतिष्ठित हुए मन में
अपने अधिष्ठानभूत परमात्म-तत्त्व का साक्षात्कार अवश्यंभावी होने से जन्म आदि की प्रसक्ति नहीं
है, ऐसा कहते हैं ।
हृदय में चन्द्र ओर सूर्य का प्रतिदिन उदय और अस्तमय का (प्राणरूप सूर्य एवं अपानरूप चन्द्र की
तत्-तत् व्यान आदि वृत्ति-विशेषों का) परिज्ञान कर तथा मन के अधिष्ठानभूत परमात्मा का ज्ञानकर
मन फिर उत्पन्न नहीं होता