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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 44

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 25, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

हार्दं तु क्षपयेद्ध्वान्तं यत्क्षये सिद्धिरुत्तमा । बाह्ये तमसि संक्षीणो लोकालोकः प्रजायते ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि शंका हो कि हृदय में आत्म-साक्षात्कार से क्या फल ? बाह्य अन्धकार से बाहर ही अपरिच्छिन्न आत्मा के आवृत होने के कारण बाह्य अन्धकार के विनाश के लिए बाह्मज्योति की ही अन्वेषणा क्‍यों नहीं करनी चाहिए ? तो इस पर कहते हैं। यद्यपि हृदयस्थित आत्म-साक्षात्काररूप प्रकाश मोक्ष की सिद्धि के लिए बाह्य तम का न विनाश करता है न उसकी रक्षा ही करता है, तथापि हृदयगत अज्ञानरूप अन्धकार का तो विनाश करता ही है, उसीका विनाश होने पर उत्तम मोक्षरूपा सिद्धि प्राप्त हो जाती है। तात्पर्य यह हुआ कि बाह्य अन्धकार की कल्पना के भी हृदयगत अन्धकार से ही जनित होने के कारण उसके हेतुभूत हृदयान्धकार के विनाश से बाह्मान्धकार का विनाश अर्थतः सिद्ध हो जाता है ॥४ ३॥ बाह्य प्रकाश के द्वारा हुआ बाह्य अन्धकार का विनाश एकमात्र रूप आदि के दर्शन में ही कारण है, बाहर आत्म-दर्शन में कारण नहीं, इस आशय से कहते हैं। हे मुने, बाह्य अन्धकार के नष्ट हो जाने पर घटादिगत रूप आदि का प्रत्यक्ष होता है और हृदयगत अन्धकार के नष्ट हो जाने पर तो आत्मा का प्रत्यक्ष होता है