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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 26, Verses 20–21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 26, verses 20–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

अयं बन्धुः परश्चायं ममायमयमन्यतः । इति ब्रह्मन्न जानामि तेन जीवाम्यनामयः ॥ २० ॥ सर्वं सर्वपदाभासमनाद्यन्तमनामयम् । अहं चिदिति जानामि तेन जीवाम्यनामयः ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

हे ब्रह्मन्‌, यह मेरा बन्धु है, यह मेरा शत्रु है, यह मेरा है एवं यह दूसरे का है, इस प्रकार की भिन्नता तो मैं जानता ही नहीं इसलिए अनामय होकर जीवित हूँ