Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 27, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 27, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 27 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
भुशुण्ड उवाच ।
एतत्ते कथितं ब्रह्मन्यथास्मि यदिहास्मि च ।
त्वदाज्ञामात्रसिद्ध्यर्थं धार्ष्ट्येन ज्ञानपारग ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
छब्बीसवाँ सर्गे समाप्त
यत्ताईसवाँ सर्ग
जाने की इच्छा कर रहे वसिष्ठजी द्वारा भुशुण्ड की प्रशंसा,
भुशुण्ड द्वारा वसिष्ठजी का पूजन तथा आकाशमार्ग से वसिष्ठजी की स्वलोकप्राप्ति इनका वर्णन ।
भुशुण्ड ने कहा : हे ज्ञान के पारंगत ब्रह्मन्, एकमात्र आपकी आज्ञा का परिपालन करने के लिए
ही धृष्टता का अवलम्बन कर जिस प्रकार से मैं चिरंजीवी हूँ और जिस प्रकार से परमार्थरूप इस
कार्यकारणसंघातरूप देह में मेरी स्थिति है, वह सब कुछ मैंने आपसे कह दिया