Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 27, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 27, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 27 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
यावदद्य दृशो धन्याः स्वात्मोदन्तमखण्डितम् ।
यथावत्पावनं बुद्धेः सर्वं कथितवानसि ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे पक्षिराज, ये मेरे नेत्र भी धन्य हैं जो तब से लेकर अब तक
आपके दर्शन करते रहे। आपने बुद्धि को पवित्र करनेवाला अखण्डित (अक्षरशः अपना सम्पूर्ण
जीवनवृत्तान्त) ज्यों का त्यों ठीक ठीक कहा