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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 28, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

प्रतिभासविधौ देहः सन्नसंश्चान्यदा स्मृतः । आभासमात्रमेवेदमित्थं संप्रति भासते ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

(उपर्युक्त विविध दृष्टान्तं से यह निश्चित हुआ कि) देह की प्रतीति होने पर ही देह सत्य-सी प्रतीत होती है, अन्य समय में असत्‌ ही है, इसलिए यह शरीर आदि, जो केवल आभासरूप ही है, अज्ञानदशा में ही भासते हैं