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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verses 30–31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 28, verses 30–31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

द्रक्ष्यसि त्वं तदा सम्यगिदमर्कोदये यथा । स्वप्नसंकल्पजालेन यथान्यैव जगत्स्थितिः ॥ ३० ॥ तथैवेयं हि संकल्पकलना काचिदेव हि । यथा पूर्वं मयोत्पत्तिः प्रोक्ता कमलजन्मनः ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामजी, स्वप्न ओर संकल्पों से (मनोराज्यों से) जैसे एक विलक्षण ही जगत की स्थिति प्रतीत होती है, वैसे ही यह व्यावहारिक जगत की स्थिति भी एक प्रकार से संकल्पजनित एवं विलक्षण (अनिर्वचनीय) ही है