Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 28, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
संकल्पकलनामात्रं तथेदमवभासनम् ।
यथा कल्पित आभासो मनसोऽब्जजतां गतः ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐन्दव के उपाख्यान में जो कहा जा चुका है, उसका भी स्मरण करना चाहिए, ऐसा कहते हैं।
हे श्रीरामजी, ब्रह्माजी के मन से संकल्पित चिदाभास जिस प्रकार ब्रह्माजी की स्वरूपता को प्राप्त
हुआ है, उसी प्रकार पूर्व देह के उत्क्रमण के समय में संकल्पित जो शरीर होता है, उसी के सदृश दूसरा
शरीर आगे के लिए स्थित रहता है