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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 44

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 28, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

स्वसंकल्पे हि संसारे न तथैति भयं सुधीः । स्व एव हि स्वभावोऽयमित्थं संप्रति भासते ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

चूँकि, बहिर्मुख दशा में यह अपनी आत्मा ही इस प्रकार जगद्रूप मेँ भासती है, इसलिए कौन विद्वान इस संसाररूपी मार्ग की स्थिति में किससे क्योकर उरेगा ?२