Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
यथा दीपो निवातस्थः स्वात्मन्येवावतिष्ठते ।
साक्षिवत्सर्वभावेषु तथा तिष्ठेज्जगत्स्थितौ ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मा कर्ता नहीं है, इस निश्चय का फल कहते हैं।
जैसे वायुशून्य प्रदेश में रहनेवाला दीपक अपने स्वरूप में ही अवस्थित रहता है, वैसे ही इस
जगत्स्थिति में एवं समस्त भूतों में साक्षी के सदृश तटस्थ होकर अपने स्वरूप में ही स्थित रहना
चाहिए