Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 75
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 75 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 75
संस्कृत श्लोक
जगज्जरदरण्येऽस्मिंश्चरद्भूतमृगव्रजे ।
धृतिं तृणरसै राम मा गच्छ मृगपोतवत् ॥ ७५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, संचरण कर रहे प्राणीरूपी मृगों से व्याप्त इस संसाररूपी अरण्य
में, हिरन के बच्चे की नाई, तृणों के सदृश निःसार विषय-रसों से आप अपने को कृतकृत्य मत
मानिए