Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 78
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 78 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 78
संस्कृत श्लोक
अत्यल्पकालशिशिरे कर्दमालेपदायिनि ।
न मङ्क्तव्यं बन्धुरूपे महिषेणेव पल्वले ॥ ७८ ॥
हिन्दी अर्थ
समानस्वभाव होने के कारण बन्धुजनो के साथ सदा ही अवस्थान और उनसे सुख देखा गया है,
फिर उसमे दोष ही क्या है 2 इस पर कहते है ।
भद्र, यह बन्धुवर्गं एक तरह से अत्यन्त थोडे समय के लिए दण्डक पहुँचानेवाला तथा आसक्तिरूप
कीचड़ से चारों ओर लीप देनेवाला छोटा जलाशय है, अतः उसमें आपको, भसे की नाई, डूबना नहीं
चाहिए