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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 80

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 80 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 80

संस्कृत श्लोक

अपवित्रस्य तुच्छस्य दुर्भगस्य दुराकृतेः । देहस्यार्थं न मङ्क्तव्यं चिन्ताचण्डी सुदारुणा ॥ ८० ॥

हिन्दी अर्थ

अपवित्र, तुच्छ, भाग्यरहित तथा दुष्टरूपवाले शरीर के लिए आसक्तिरूपी कीचड़ मेँ कभी फँसना नहीं चाहिए, क्योकि उसमें फँसे हुए पुरुषों को चिन्तारूप क्रूर राक्षसी खा डालती है