Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 3, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 3, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
यदुपादेयबुद्ध्या च तद्दुःखाय सुखाय ते ।
भावाभावेन नादेयमकर्तृ सुखदुःखयोः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, जिन विषयों का उपादेयबुद्धि से ग्रहण करेंगे, वे ही आपके दुःख एवं सुख के लिए
होंगे, उपादेय बुद्धि न होने पर कुछ ग्रहण करने योग्य नहीं रहता । जो अगृहीत रहता है, वह सुख
या दुःख का उत्पादक नहीं होता, यह बात प्रसिद्ध है, इसलिए ज्ञानी पुरुष को सुख या दुःख की
प्राप्ति नहीं हो सकती