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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 3, Verse 15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 3, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

अन्तर्व्योमामलो बाह्ये सम्यगाचारचञ्चुरः । हर्षामर्षविकारेषु काष्ठलोष्टसमस्थितिः ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

भद्र, आप भीतर से आकाश की नाई निर्मल, बाहर से अपने वर्णाश्रमानुकूल सुन्दर आचरणों में निरत एवं हर्ष ओर अमर्ष के सम्पादक विकारों की सन्निधि में काष्ठ और लोष्ठ के सदृश स्थितिवाले हो जाइए