Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 3, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 3, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
समूलकाषं कषति नदीतट इव द्रुमम् ।
यः सौहृदं मत्सरं च स हर्षामर्षदोषहा ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
उसी से हर्ष-अमर्ष दोष की निवृत्ति होती है, ऐसा कहते हैं।
जिस प्रकार तटवर्ती वृक्ष को नदी वेग से मूलोच्छेदनपूर्वक उखाड़कर फेंक देती है, इसी प्रकार जो
महात्मा सौहार्द और मात्सर्य को वेग से समूल उखाड़कर फेंक देता है, वही हर्ष और अमर्षरूपी दोषों का
विनाश कर सकता है, दूसरा नहीं