Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
शिवः सर्वपदातीतः सर्वसंकल्पनातिगः ।
सर्वसंकल्पवलितो न सर्वो न च सर्वकः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
समस्त ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि
देवताओं से तथा समस्त मनोवृत्तियों से परे एवं समस्त पदों से दुर्ञेय शिव ही परम देव है और समस्त
विषयभोगों के संकल्पो से वेष्टित ब्रह्मा, विष्णु आदि रूप जो देव हैं, वे साधन से भी पूर्ण नहीं हैं और
सर्वविध सुखभोगरूप फलों से भी परिपूर्णं नहीं हे । (क्योकि अपने-अपने कर्म ओर उपासना के तारतम्य
अनुसार ही भोगसामग्री ओर उसके फलभूत सुखका लवमात्र ही वहाँ पर रहता है, यह तात्पर्य हे ।)