Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 71
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 71 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 71
संस्कृत श्लोक
चित्स्वयं चेत्यतामेति साकाशपरमाणुताम् ।
शब्दबीजात्मिकां पश्चाद्वाततन्मात्रगामिनी ॥ ७१ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वयं चिति ही आकाशसहित सूक्ष्म भूतों की स्वरूपता;
शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धात्मक भोग्यो की बीजरूप चेत्यता यानी मायाउपलक्षित चैतन्य की
विषयता प्राप्त करती है ओर उसके बाद समष्टि -प्राणरूपता प्राप्त करती है