Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 73
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 73 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 73
संस्कृत श्लोक
मनस्त्वं समुपायाता संसारमवलम्बते ।
चण्डालोऽस्मीति मननाच्चण्डालत्वमिव द्विजः ॥ ७३ ॥
हिन्दी अर्थ
मनरूपता
को प्राप्त हुई चिति उस प्रकार संसार का अवलम्बन कर लेती है, जिस प्रकार “मे चण्डाल हूँ” इस
भावना से ब्राह्मण चण्डालरूपता का अवलम्बन करता है