Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 84
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 84 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 84
संस्कृत श्लोक
उष्ट्रीव मधुरं विन्दुं वाञ्छते भावितं सुखम् ।
अवान्तरपरिभ्रष्टा दोषाद्दोषं पतत्यधः ॥ ८४ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस प्रकार ऊँटनी कोटि ओर नीम के पत्ते खाते समय अपनी
वासना से भावित स्वल्प मधुर रस की अभिलाषा करती है, उसी प्रकार दुःखमय विषयों के रहते चिति
उनसे सुख की अभिलाषा करती है बीच ही में भ्रष्ट होकर एक दोष से दूसरा दोष प्राप्तकर नीचे की
ओर गिरती जाती है । अथवा जैसे ऊँटनी विषम ऊँचे तट पर उगे हुए वृक्ष के अग्रभाग में सम्बद्ध मधु-
पटल में अवस्थित मधु-विन्दु चाटने की इच्छा से वृक्ष पर चढने की लालसा करती हुई किये गये एक
साथ अगले पैरों के उन्नयन से ही अपने विशाल देहभार के कारण बीच मेँ ही फिसलकर नीचे की ओर
विषम प्रदेश में गिरती जाती है, वैसे ही यह चिति भी उन्नत विषम विषयवृक्ष के ऊपर सुखरूपी मधु-
बिन्दु चाटने की अभिलाषा से चढने की इच्छा कर रही बीच में ही फिसलकर नीचे की ओर गिरती जाती
है