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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 86

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 86 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 86

संस्कृत श्लोक

नानानर्थगणोपेता चेष्टापरवशाशया । कष्टात्कष्टमनुप्राप्ता परितापानुतापिनी ॥ ८६ ॥

हिन्दी अर्थ

अनेक अनर्थ-समूहों से युक्त चेष्टाओं से परवश हृदयवाली वह चिति नरक आदि भूमिय में एक कष्ट से दूसरे कष्ट को प्राप्त होकर चारों ओर के तापो से निरन्तर सन्तप्त हुआ करती है