Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 98
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 98 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 98
संस्कृत श्लोक
क्वचिदुज्ज्वलिताकारा क्वचित्कष्टा शिला क्वचित् ।
क्वचिन्नीलाथ हरिता क्वचिदग्निः क्वचिन्मही ॥ ९८ ॥
हिन्दी अर्थ
चिति ही कहीं उज्ज्वलित आकारवाली,
कहीं कुश-कण्टक आदि से दुर्गम, कहीं शिलारूप, कहीं नीलरूप, कहीं हरितरूप, कहीं अग्निरूप
ओर कहीं महीरूप बन जाती हे