Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 31, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
तज्ज्ञेऽप्यभावनामात्रादृतेऽन्यत्रोपयुज्यते ।
न तृणं न च त्रैलोक्यमिति स्वायत्ततात्र या ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
यही कारण है कि तृण की नाई तिरस्कार के योग्य भी यह त्रैलोक्यपदार्थ केवल भावना के यानी
वासना के बल से अज्ञानियो के लिए दुःसाध्य होकर स्थित है, इसे कहते है।
(739) आदिपद से मननकर्ता, मति और मति के विषय; बोद्धा, बोध और बोध के विषय तथा
अहंकर्ता (अहमाभिमानकर्ता), अहंकार और अहंकार के विषयों का ग्रहण किया गया है ।
(८) यहाँ पर आदि पद से स्वदेहत्व आदि धर्मो के आश्रय, उनके व्याप्य धर्म एवं उनके सम्बन्धो
का ग्रहण किया गया है ।
पूर्वोक्त प्रकार की तव-ममात्मक जो भावना है, वही इस दुःखादि की प्रसक्ति में कारण है, उस
भावना में पुरुष की स्वतन्त्रता है यानी वह भावना कर सकता है ओर नहीं भी कर सकता हे । ऐसी
स्थिति में जैसे तृण का परित्याग दुःसाध्य नहीं हे, वैसे ही त्रैलोक्य का परित्याग भी दुःसाध्य नहीं
हे