Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verses 17–18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 31, verses 17–18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 17, 18
संस्कृत श्लोक
सैषावभासनकरी सर्वगा नित्यनिर्मला ।
नित्योदिता निर्मनस्का निर्विकारा निरञ्जना ॥ १७ ॥
घटे पटे वटे कुड्ये शकटे वानरे खरे ।
असुरे सागरे भूते नरे नागे च संस्थिता ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
वह चिति सम्पूर्ण पदार्थो का अवभास करनेवाली सर्वव्यापक, नित्य, निर्मल, नित्योदित, मन
से रहित, सकल विकारों से वर्जित ओर निरंजन है । एक वही घट और पट में, वट और दीवार में, शकट
ओर वानर में, गदहे ओर असुर मे, सागर और भूत मे, तथा नर और नाग में सर्वत्र संस्थित है