Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 31, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
सा परैव चिदत्यच्छा चिन्तामायाति चेतनात् ।
साधुरेव यथाऽसाधुर्भाविते दुर्जनैषणाः ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस प्रकार साधु हुआ पुरुष भी दुर्जन-संगति से चिरकाल तक चित्तके
संस्कृत होने पर दजन की इच्छाएँ लेकर असाधु हो जाता है, उसी प्रकार अत्यन्त स्वच्छ परा चिति ही
देहादि में तादात्म्याभिमान करने से तदनुकूल-प्राप्ति की और प्रतिकूल परिहार आदि की चिन्ता करती
है (और स्वयं जड देहादिरूप हो जाती है ।)