Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 31, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
रथस्त्वत्र स्मृतः प्राणः कल्पनाया मुनीश्वर ।
यत्र प्राणमरुत्तत्र मननं परितिष्ठति ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
“मन का रथ प्राण है” यह जो कहा गया है, उसमें वक्ष्यमाण अर्थोपयोगी कुछ वैशिष्ट्य कहने के
लिए उपपत्ति कहते है।
हे मुनीश्वर, मानस कल्पना का निमित्त होने से यहाँ पर मन का रथ प्राण कहा गया हे । जहाँ पर
प्राण-वायु रहता है, वहीं पर मननात्मक संकल्प की स्थिति रहती है