Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 32, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
आधिव्याधिभिराकीर्णशरीराम्भोजषट्पदः ।
जीवो वैषम्यमायाति तरङ्गत्वे यथा पयः ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे तरंगरूप के होने पर जल विषमता प्राप्त करता है, वैसे ही आधि एवं व्याधि से आक्रान्त
शरीररूपी कमल का भ्रमर यह जीव दैन्य, दुःख आदि विषमता प्राप्त करता रहता है