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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verses 34–36

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 32, verses 34–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

स्वसंवित्तिवशाज्जीवो वैवश्यमुपगच्छति । पद्मयन्त्रं शरीरस्थं प्रवाहं याति नित्यदा ॥ ३४ ॥ वासना विमला येषां हृदयान्नापसर्पति । स्थिरैकरूपजीवास्ते जीवन्मुक्ताश्चिरायुषः ॥ ३५ ॥ संरुद्धे पद्मयन्त्रे हि प्राणे शान्तिमुपागते । देहः पतत्यधैर्योऽयं काष्ठलोष्टसमः क्षितौ ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

जब शरीर का हृदय-कमलरूपी यन्त्र सदा चलता रहता है तब यह जीव अपने संकल्पवश मरण आदि हजारों दुःख प्राप्त करता रहता है