Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verses 52–53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 32, verses 52–53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
सर्वगापि चिदेतस्मिंश्चेतसि प्रतिबिम्बति ।
पदार्थमन्तरादत्ते नान्यो हि मुकुरादृते ॥ ५२ ॥
चिदमलनभसि प्रयत्नरूपाः परिवितते तदतन्मयाः स्फुरन्ति ।
कलकलमुखराः स्फुटाभिरामा विविधशरीरविमोहतापनाय ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
कथित अर्थ का ही उपसंहार करने के लिए अनुवाद करते हैं।
सर्वत्र व्याप्त भी यह चिति इसी चित्त में प्रतिबिम्बित होती है, क्योकि दर्पण के बिना दूसरा कोई भी
अपने भीतर पदार्थो का ग्रहण नहीं करता