Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 33, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
पुष्पपल्लवपत्रादि लताया नेतरद्यथा ।
द्वित्वैकत्वजगत्त्वादि त्वन्त्वाहन्त्वं तथा चितेः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
तथाच “अपागादग्नेरग्नित्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्, इस श्रुति
प्रदर्शित न्याय से लता आदि में ऐक्य का दर्शन होने पर जैसे उसके पुष्प पल्लव आदि भेदो में अनृतत्व
(मिथ्यात्व) सिद्ध ही हो जाता है, वैसे ही आत्मतत्व का साक्षात्कार होने पर जागतिक भेदो में अनृतत्व
सिद्ध ही हो जाता है, इसलिए इस विषय में तुम्हारा प्रश्न निराधार है, ऐसा कहते है।
भद्र, जिस प्रकार फूल, कोंपल, पत्ता आदि लता से वास्तव में भिन्न नहीं हैं, वैसे ही द्वित्व, एकत्व,
जगत्त्व, त्वन्त्व, अहन्त्व आदि भी चिति से भिन्न नहीं है