Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 33, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
अकलङ्केन रूपेण रूपं यत्सकलङ्कवत् ।
संसारसरितं प्राप्य चेतनेनैव चेतति ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि चिति कलंक निर्मुक्त रूप से ही सदा अवस्थित है; तथापि
कलंकयुक्त जिस पुर्यष्टक रूप की उसने कल्पना कर रक्खी है, उस रूप से संसाररूपी नदी में पहुँचकर
उपाधियुक्त चेतन से ही स्फुरित होती है । अपने निष्कलंक चेतन से नहीं, यह भाव है