Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 24

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 33, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

आतिवाहिकदेहोऽपि जीवतां समुपागतः । भावनापञ्चकं भूत्वा द्रव्यमस्मीति वेत्त्यलम् ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

“सर्वव्यापक होती हुई भी चिति इस चित्त में प्रतिबिम्बित होती है” (नि. 32/५२) इस वचन पर किये गये आक्षेप का उक्त रीति से समाधान कर अव (ढ़ भावना से पश्चात उसी मे चिति अहन्ताशक्तिवाली होती है” (नि. २।४२) इस वचन पर किये गये आक्षेप का समाधान करने के लिए चिति को स्थूल देह-प्राप्ति का क्रम बतलाते हैं। जीवरूपता को प्राप्त हुई यह लो कान्तरगामी सूक्ष्मशरीररूप भी चितिपंचभूतात्मक- स्थूलदेहविषयक संस्कारस्वरूप होकर देह-प्राप्ति के लिए “भें धान, जव, तिल उडद आदि द्रव्यरूपहो गई हूँ, यों भली प्रकार जानती हे । इस विषय में "त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पतयस्तिलमाषा इति (५) जायन्ते.) क्षीण कर्मा अनुशयी लोग इस पृथिवी में धान, जव, ओषधि, वनस्पति, तिल, उडद आदि भाविशरीरानुकूल द्रव्यरूप से उत्पन्न होते हैं) यह छान्दोग्य-श्रुति ( ५।१०।६) प्रमाणरूप हे