Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 33, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
काकतालीययोगेन दृढाभ्यासक्षयेण च ।
वासनान्तरसंश्लेषात्सूक्ष्ममाकारमुज्झति ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि शका हो कि जिस स्थल में मच्छर आदि सूक्ष्म देह का त्याग हुआ है, उस स्थल में उक्त
देहाकारवासनात्मना सूक्ष्मरूप से स्थित हुए पुर्यष्टक के दढ अभ्यस्त मच्छर के आकार की और सूक्ष्मपन
की निवृत्ति कैसे होगी तथा उसे अनभ्यस्त स्थूल हाथी के आकार का ओर स्थूलता का लाभ कैसे
होगा ? तो इस पर कहते हैं।
जिस प्रकार कौए और तालवृक्ष के आकस्मिक सम्बन्ध में कौए के मरण में प्रयोजक हेतु कर्म
ही है, दूसरा कोई नहीं, उसी प्रकार दढ अभ्यस्त वासना के तिरोभाव में और चिरकाल से व्यवहित
(दूर रहे) हाथी आदि में अहंभाव-वासना के आविर्भाव में कर्म ही निमित्त है। अतः वह अन्य उद्भूत
हुई हाथी आदि की वासना के सम्बन्ध से चिरकाल से अभ्यस्त हुए भी सूक्ष्म मच्छर आदि आकार
का त्याग करता है