Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 34, Verses 14–16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 34, verses 14–16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 14-16
संस्कृत श्लोक
घनसौषुप्तलेखावच्छिलान्तःसन्निवेशवत् ।
सैन्धवान्तस्थरसवद्वातान्तःस्पन्दशक्तिवत् ॥ १४ ॥
कालेनायाति तत्रैव परां परिणतिं यदा ।
शून्यशक्तिरिवाकाशे परमाकाशगा तदा ॥ १५ ॥
चेत्यांशोन्मुखतां नूनं त्यजत्यम्ब्विव चापलम् ।
वातलेखेव चलनं पुष्पलेखेव सौरभम् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
दूसरी अवस्था में पहली अवस्था की अपेक्षा चितिशक्ति के जो विशेष धर्म हैं, उन्हें कहते है ।
निबिड सुषुप्ति-स्थिति की झलक के सदुश, पाषाणशिला के भीतरी अवयवगठन के सदृश, सैंधव
नमक के अन्दर स्थित रस के सदृश और वायु के अन्तर्गत विद्यमान स्पन्दनशक्ति के सदृश जब पहली
भूमिका अभ्यास के द्वारा समय पाकर खूब परिपक्र हो जाती है तब आकाश में विद्यमान शून्यशक्ति की
नाई चिदेकघन ब्रह्माकाशभाव प्राप्तकर वह उस प्रकार विषयोन्मुखता का परित्याग करती है, जिस
प्रकार (वायु आदि क्षोभक पदार्थो के अभाव में) जल चंचलता का, वायु-कला चलन का ओर पुष्प
लेखा सुगन्ध का परित्याग करती हे