Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 35, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 35, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
वेदवेदार्थवेदादिजीवजालजटावली ।
ततस्तस्या अनन्तायाः प्रसृतायाः पुनःपुनः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
अनन्त होने के कारण अविद्या के विलासो का वर्णन नहीं किया जा सकता, इस आशय से
कहते है ।
इसीसे देश और काल की सम्पत्ति के अनुसार बार-बार कोटि-कोटि पदार्थो के स्वरूप में फैली
हुई असीम उस स्थूलतम अविद्या का वर्णन करने में कोन पुरुष समर्थ हो सकता हे अर्थात् कोई नहीं ।
अथवा उस प्रकार असीम अविद्या का वर्णन करने पर कोन प्रयोजन सिद्ध होगा अर्थात् कोई नहीं सिद्ध
होगा