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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 35, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 35, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

मूलबीजं महादेवः पल्लवानामिव द्रुमः । सर्वसत्त्वाभिधः सर्वः सर्वसंवेदनैककृत् ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

हे मुने, जिसने उक्त चैतन्यात्मक महादेव- तततव का परिचय कर लिया है, उसके लिए तो वही तत्त्व वन्दनीय ओर पूजनीय है, क्योकि सब प्राणियों का बल ओर अभिधान वही हे वही सर्वात्मक, प्रकाशरूप, समस्त ज्ञानों का एकमात्र उत्पादक और सबमें सत्तास्फूर्ति का प्रदान करनेवाला है