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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 35, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 35, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

इमां दृश्यदशामाशु बाह्यबोधाय वा पुनः । समाश्रित्य मदुक्तं त्वं श्रृणु तूष्णीं स्थितेन किम् ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

अथवा धीर-तलवार बनने में यदि तुम असमर्थ हो, तो उसकी प्राप्ति के लिए पुनः कुछ काल तक श्रवण आदि मे अनुकूल कुछ थोडी-सी बाह्य-दुष्टि का अवलम्बन कर लगातार तत्त्व की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करो, प्रमाद से कभी भी प्रयत्न सरे विरत मत होओ, यही कहते है। (यदि तुम तथोक्त धीर बनने में असमर्थ हो, तो) बाह्मज्ञान के (&) यानी ब्रह्मज्ञान के लिए शीघ्र ही श्रवण आदि में अनुकूल इस बाह्यदृष्टि का आश्रय लेकर मेरे द्वारा जो कुछ कहा जाय उसे तुम सुनो । आत्मज्ञान के प्रयत्न के बिना चुपचाप बैठे रहने से कौन-सा पुरुषार्थ होगा ?