Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 35, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 35, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
प्राणहीनं परिस्पन्दं त्यक्त्वा तिष्ठति मूकवत् ।
चालनी पावनी शक्तिः शक्तिः संवेदनी चितिः ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
प्राण-वायु से शून्य हुआ देहरूपी घर संचलन छोडकर मूक
के सदृश स्थित रहता हे । देहरूपी घर में चलनानुकूल क्रियाशक्ति प्राणवायु प्रयुक्त है ओर संवेदन
शक्ति तो आत्मचिति ही हे