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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 36, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 36, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 36 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

चेतनं चेतनौघानां चेतनात्मनि चेतनम् । स्वं चेत्यचेतनं चेत्यपरमं भूरिभावनम् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

सम्बन्ध से जनित अभिव्यक्ति से विषयों का प्रकाश करनेवाला प्रत्यक्‌ रूप चेतन है, चेत्यो का परम अधिष्ठानभूत तत्त्व है और अपने को ही माया से अनेक रूप में भावना कर लेनेवाला है