Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, Verses 37–38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 39, verses 37–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
दारिद्र्येणाथ राज्येन प्रवाहपतितात्मना ।
विचित्रचेष्टापुष्पेण शुद्धात्मानं समर्चयेत् ॥ ३७ ॥
नानाकलहकल्लोलललनोल्लासशालिना ।
रागद्वेषविलासेन सौम्यमात्मानमर्चयेत् ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रवाहपतितस्वरूप (प्रारब्ध-प्रवाह से
प्राप्त) दरिद्रता अथवा राज्य से और चित्रविचित्र चेष्टारूप फूलों से विशुद्धस्वरूप उस आत्मदेव की
पूजा करे