Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, Verse 62
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 39, verse 62 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 62
संस्कृत श्लोक
सोमार्कमस्तमितमानसमातृमेयं सद्यःप्रसूतशिशुवेदनवद्वितानम् ।
पश्यन्प्रशान्तमतिचेतनचित्तबीजं जीवन्ननुत्तमपदस्थित एव तिष्ठ ॥ ६२ ॥
हिन्दी अर्थ
आनन्दामृत से परिपूर्णं होने के कारण स्वयं चन्द्रमारूप होता हुआ भी जो अपने निष्कलंक
प्रकाश के आधिक्य से सूर्य हो गया है, जिसमें से मनोवृत्ति (प्रमा), प्रमाता ओर प्रमेय यह भेद चला गया
है, तत्क्षण उत्पन्न हुए बालक के ज्ञान की नाई विकल्प विस्तार से शून्य, चिदाभास एवं चेतन के
मूलभूत उस स्वात्मशिव को प्रशान्तचित्तपूर्वक देखते हुए तुम अत्युत्तम जीवन्मुक्त-पद में स्थित होकर
उसी रूप से अवस्थित हो जाओ (वही परापूजा है)