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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 4, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 4, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

एकेनैवात्मना दत्ता नानातेयं महात्मना । यथैकेनैव चन्द्रेण तिमिराप्पात्रदर्पणैः ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

उसमे युक्ति बतलाते हैं। श्रीरामजी, एकमात्र महात्मा आत्मा ने ही अपनी सत्ता के संसगध्यास से यह नानारूपता ऐसे प्राप्त कराई हे, जैसे अकेला चन्द्रमा तिमिर (नेत्र का रोगविशेष), जलपात्र ओर दर्पणो के साथ सम्बन्धविशेष से नानारूपता प्राप्त कराता है