Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 4, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 4, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
नवतामरसाकारकान्तलोचनलोलता ।
शान्ते मौर्ख्येऽक्षता वाते चलता सरसो यथा ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
उस दुर्बुदि का, जिसका आगे के व्यवहित सर्ग मेँ निरूपण होनेवाला है, प्रतीक द्वारा उदाहरण दे
रहे महाराज वसिष्ठजी अज्ञानक्षय से उसका क्षय होता है, यो बतलाते है।
जैसे वायु के शान्त हो जाने पर तालाब की चंचलता नष्ट हो जाती है, वैसे ही अज्ञान के नष्ट हो
जाने पर स्त्री आदि के शरीरो मे दुर्बुद्धि से कल्पित नवीन कमल के सदृश मनोहर लोचनो की चंचलता
नष्ट हो जाती हे