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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 40, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 40, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 40 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

यद्यद्राजत्वदीनत्वसुखदुःखादिवेदनम् । आत्मीयं परकीयं च तत्तदर्चनमात्मनः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

महर्षे, अपने ओर पराये सम्पत्ति, दरिद्रता (दीनता), सुख, दुःख, भूख, प्यास आदि का जो-जो वेदनरूप यानी अध्यारोपणरूप समर्पण है, वह सब इस आत्मदेव का पूजन ही है (तात्पर्य यह है कि देवता पर फूल, पत्ती आदि का आरोप (चढाना) ही देवपूजा इस नाम से प्रसिद्ध है, प्रकृत मेँ भी उसी प्रकार जानना चाहिए ।)