Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 41, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
सा वेद्यमिह गच्छन्ती याति चिन्नामयोग्यताम् ।
अप्यवेद्यवती नूनमुन्मन्यन्तपदस्थिता ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
वास्तव में अवेद्यवती निर्विकल्प समाधि में प्रसिद्ध चिदानन्देकरस-स्वभाव में स्थित होती हुई
भी वह संवित् जब विषय-गोचर संस्कारों के उद्बोध से विषय कल्पनाओं मे उन्मुख होती है तब
चेतनात् चित् यानी प्रकाशन करने से "चित्" इस क्रिया निमित्तनाम के योग्य बन जाती है