Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 41, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
एवमाद्यङ्गसंपन्नं संपन्नं न च किंचन ।
न ज्ञानं न च तद्रूपं न विदाचितचेतनम् ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
इस रीति से आरोप के क्रम का विस्तार कर अब उसका अपवाद-क्रम दिखलाते है ।
हे महर्षे, अज्ञानियों की दृष्टि से यों कहा गया सब कुछ सम्पन्न है, परंतु तत्त्वज्ञानियों की दृष्टि से
तो वह कुछ भी संपन्न नहीं हे । वास्तव में तो न कोई ज्ञान है, न पूर्यष्टकरूप आकृति हे ओर न
चिदाभास से अचित् का चेतन ही होता है