Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 41, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
सर्वं स्थूलत्वमापन्नं तदेवाशु प्रपश्यति ।
तस्य तन्मात्ररन्ध्राणि यथादेशं प्रपश्यति ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
ओर स्थूलदेह के सम्बन्ध से सब आन्तरिक कोशचतुष्टय तथा बाह्य विषय समूहों
का, जो स्थूलता को प्राप्त हो चुके हैं, ब्रह्म ही तत्काल अपनी कल्पना से अवलोकन किया करता
है । बाह्यरूप आदि के दर्शन में वह उस देह के चक्षुरिन्द्रिय आदि स्वरूप छिद्रों का यानी द्वारो का
भी जो विषयों के अनुसार अपने-अपने कार्यो में व्यवस्थित भी हैं, भलीभाँति अवलोकन किया
करता हे